Heart Disease in Men: लंबे समय तक यह आम धारणा रही है कि दिल से जुड़ी बीमारियां मुख्य रूप से बुजुर्गों की समस्या होती हैं और 60 साल की उम्र के बाद ही इसका खतरा बढ़ता है। लेकिन हालिया वैज्ञानिक शोध इस सोच को पूरी तरह चुनौती दे रहा है। अब रिसर्च यह संकेत दे रही है कि पुरुषों में हृदय रोग का खतरा अपेक्षाकृत कम उम्र में ही बढ़ने लगता है। खासतौर पर 35 की उम्र के आसपास यह जोखिम तेजी से उभरता है, जिसे विशेषज्ञ एक गंभीर चेतावनी के रूप में देख रहे हैं।
हाल ही में प्रकाशित CARDIA (Coronary Artery Risk Development in Young Adults) स्टडी ने इस दिशा में चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे हैं। यह एक दीर्घकालिक अध्ययन है, जिसमें 18 से 30 वर्ष की आयु के 5,000 से अधिक युवाओं के स्वास्थ्य को कई वर्षों तक ट्रैक किया गया। इस रिसर्च का मकसद युवावस्था से ही हृदय रोगों के विकास को समझना था।
CARDIA स्टडी के अहम निष्कर्ष
अध्ययन के अनुसार, शुरुआती युवावस्था यानी 20 से 29 वर्ष की उम्र तक पुरुषों और महिलाओं दोनों में हृदय रोग का जोखिम लगभग समान रहता है। इस चरण में शरीर अपेक्षाकृत मजबूत होता है और दिल पर बाहरी कारकों का असर सीमित रहता है। लेकिन जैसे ही उम्र 30 के दशक के मध्य में पहुंचती है, तस्वीर तेजी से बदलने लगती है।
करीब 35 वर्ष की आयु के बाद पुरुषों में हृदय रोग का जोखिम महिलाओं की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ता है। रिसर्च बताती है कि पुरुषों का हृदय स्वास्थ्य औसतन महिलाओं से लगभग 10 साल पहले बिगड़ना शुरू हो जाता है। यह अंतर 50 साल की उम्र तक बना रहता है, जिसके बाद महिलाओं में भी जोखिम बढ़ने लगता है।
पुरुषों में खतरा जल्दी क्यों बढ़ता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे जैविक और जीवनशैली से जुड़े कई कारण हैं। जैविक स्तर पर महिलाओं को एक प्राकृतिक बढ़त मिलती है। एस्ट्रोजन हार्मोन महिलाओं के हृदय को एक निश्चित उम्र तक सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे धमनियां लचीली बनी रहती हैं और कोलेस्ट्रॉल का संतुलन बेहतर रहता है। पुरुषों में यह हार्मोनल सुरक्षा नहीं होती।
वहीं, व्यवहारिक कारणों की बात करें तो पुरुषों में कम उम्र से ही कुछ जोखिम भरी आदतें अधिक देखी जाती हैं। धूम्रपान, अत्यधिक शराब का सेवन, असंतुलित खानपान और अनियमित दिनचर्या दिल पर धीरे-धीरे नकारात्मक असर डालती हैं। इसके अलावा, आधुनिक कार्यसंस्कृति में बढ़ता मानसिक दबाव भी एक बड़ा कारण है। लंबे समय तक तनाव में रहने से ब्लड प्रेशर और हार्ट रेट पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
शारीरिक निष्क्रियता भी एक अहम पहलू है। डेस्क जॉब, घंटों स्क्रीन के सामने बैठना और नियमित व्यायाम की कमी दिल की धमनियों को समय से पहले सख्त बना सकती है, जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।
युवावस्था से ही बचाव क्यों जरूरी?
हेल्थ एक्सपर्ट्स इस बात पर जोर देते हैं कि हृदय रोग अचानक नहीं होते, बल्कि यह वर्षों की गलत आदतों का नतीजा होते हैं। दिल की बीमारी की नींव अक्सर 20 और 30 की उम्र में ही पड़ जाती है, लेकिन इसके लक्षण बाद में सामने आते हैं। इसलिए रोकथाम की शुरुआत जितनी जल्दी होगी, भविष्य उतना ही सुरक्षित रहेगा।
बचाव के उपाय: 20 की उम्र से ही करें शुरुआत
विशेषज्ञों के अनुसार, स्वस्थ दिल के लिए कुछ बुनियादी कदम बेहद असरदार हो सकते हैं। संतुलित आहार अपनाना, जिसमें नमक, चीनी और सैचुरेटेड फैट सीमित मात्रा में हों, बेहद जरूरी है। नियमित व्यायाम—चाहे वह रोज़ 30 मिनट की तेज़ चाल हो या हल्का कार्डियो—दिल को सक्रिय रखता है।
इसके साथ ही 7–8 घंटे की पर्याप्त नींद शरीर और हृदय की रिकवरी के लिए आवश्यक है। तनाव को नियंत्रित करने के लिए ध्यान, योग या किसी पसंदीदा गतिविधि को दिनचर्या में शामिल करना फायदेमंद हो सकता है। समय-समय पर ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर की जांच कराते रहना भी जोखिम को समय रहते पहचानने में मदद करता है।
विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि “हृदय रोगों की शुरुआत बुढ़ापे में नहीं, बल्कि युवावस्था की लापरवाही से होती है। अगर 30 की उम्र से ही सतर्कता बरती जाए, तो हार्ट अटैक जैसी गंभीर स्थितियों को काफी हद तक टाला जा सकता है।”

