Health Insurance के बावजूद मरीज क्यों उठा रहे 95% खर्च? NSO रिपोर्ट

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Health Insurance: देश में हेल्थ इंश्योरेंस लेने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसके बावजूद इलाज का आर्थिक बोझ कम होने के बजाय अब भी आम लोगों पर भारी पड़ रहा है। National Statistical Office (NSO) की 2025 की घरेलू उपभोग सर्वे रिपोर्ट ने इस सच्चाई को उजागर किया है कि बीमा होने के बावजूद मरीजों को इलाज का बड़ा हिस्सा अपनी जेब से ही खर्च करना पड़ रहा है।

बढ़ा कवरेज, लेकिन राहत नहीं

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। फिर भी Out-of-Pocket Expenditure (OOPE) यानी अपनी जेब से होने वाला खर्च कम नहीं हुआ है। इसका मतलब यह है कि बीमा होने के बावजूद लोगों को इलाज के लिए अपनी बचत खर्च करनी पड़ रही है या उधार लेना पड़ रहा है।

ग्रामीण भारत की स्थिति

ग्रामीण क्षेत्रों में हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज 2017-18 के 13% से बढ़कर अब 46% हो गया है। यह एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन असली समस्या तब सामने आती है जब अस्पताल खर्च की बात होती है।

ग्रामीण इलाकों में अस्पताल में भर्ती होने पर औसतन ₹33,000 का खर्च आता है, जिसमें से लगभग 95% राशि मरीज खुद वहन कर रहे हैं। यह दर्शाता है कि बीमा पॉलिसी होने के बावजूद उसका पूरा लाभ लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है।

शहरी क्षेत्रों की स्थिति

शहरी भारत में भी हालात बहुत अलग नहीं हैं। यहां हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज 9% से बढ़कर 32% हो गया है। लेकिन इलाज का खर्च अभी भी काफी ज्यादा है।

शहरों में औसत अस्पताल खर्च लगभग ₹47,000 है, जिसमें से करीब 83% खर्च मरीजों को अपनी जेब से देना पड़ रहा है। यानी बीमा होने के बावजूद आर्थिक बोझ बना हुआ है।

इलाज का खर्च हुआ दोगुना

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि पिछले 7–8 वर्षों में इलाज का खर्च लगभग दोगुना हो गया है:

  • ग्रामीण क्षेत्रों में 97% की बढ़ोतरी
  • शहरी क्षेत्रों में 77% की बढ़ोतरी

इसका मुख्य कारण निजी अस्पतालों में बढ़ती लागत को माना जा रहा है, जहां इलाज काफी महंगा हो गया है।

प्रसव और भर्ती की स्थिति

रिपोर्ट के अनुसार, प्रसव के दौरान होने वाला खर्च और मरीज द्वारा अपनी जेब से किया गया भुगतान लगभग बराबर है। इसका मतलब है कि इस क्षेत्र में भी बीमा से पर्याप्त राहत नहीं मिल पा रही है।

देश में प्रति 1,000 लोगों पर अस्पताल में भर्ती होने की दर 29 पर स्थिर बनी हुई है, जिसमें ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में मामूली अंतर देखा गया है।

क्यों नहीं मिल रही पूरी राहत?

विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं:

  • बीमा पॉलिसी में सीमित कवरेज
  • क्लेम की शर्तें और सीमाएं
  • कई अस्पतालों में कैशलेस सुविधा की कमी
  • निजी अस्पतालों में बढ़ती फीस

इन कारणों से मरीजों को अपनी जेब से ज्यादा खर्च करना पड़ता है।

यह रिपोर्ट भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बड़ी चुनौती को सामने लाती है। जहां एक ओर इंश्योरेंस कवरेज बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर मरीजों को आर्थिक राहत नहीं मिल पा रही है।

जब तक बीमा योजनाओं को अधिक प्रभावी और व्यापक नहीं बनाया जाता, तब तक आम लोगों के लिए इलाज महंगा ही बना रहेगा। यह स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि सिर्फ बीमा लेना ही काफी नहीं है, बल्कि उसका सही लाभ मिलना भी उतना ही जरूरी है।