SMB Foundation: गरीब बच्चों की जिंदगी में उम्मीद की रौशनी फैला रहा है एसएमबी फाउंडेशन

A classroom of smiling underprivileged children at SMB Foundation Rohini centre raising their hands during a joyful learning session in Delhi.
Children at SMB Foundation’s Rohini centre raise their hands with smiles during an after-school learning session — a glimpse of hope and happiness in Delhi’s slum community.

SMB Foundation: नई दिल्ली। रोहिणी सेक्टर 28 की एक गली में, एक छोटे से कमरे से बच्चों की हंसी और कविता की आवाजें गूंज उठती हैं। यह किसी स्कूल की कक्षा नहीं, बल्कि एसएमबी फाउंडेशन का केंद्र है — एक ऐसी जगह जहां शहर के सबसे वंचित बच्चे अपना दूसरा घर पाते हैं।

जहां महानगरों की चमक में अक्सर झुग्गी बस्तियों की जिंदगी धुंधली पड़ जाती है, वहीं यह संस्था उन बच्चों के जीवन में रौशनी की नई किरण बनकर उभरी है जो बड़े एनजीओ और सरकारी योजनाओं की नजरों से अब तक अनदेखे रहे हैं।

झुग्गियों से निकलती उम्मीद की कहानियां

भारत में हजारों एनजीओ बच्चों की शिक्षा और कल्याण के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन एसएमबी फाउंडेशन की खासियत यह है कि यह उन इलाकों में जाता है जहां जरूरत सबसे ज्यादा है — उन झोपड़ पट्टियों में जहां शिक्षा एक सपना है और सुरक्षा एक संघर्ष।

अक्सर कामकाजी परिवारों के बच्चे स्कूल के बाद ‘क्रेस’ में भेजे जाते हैं, जहां फीस देकर उनकी देखरेख होती है। लेकिन मजदूर, दिहाड़ीदार या घरेलू कामगार परिवारों के पास यह सुविधा नहीं होती। पति-पत्नी दोनों दिनभर मेहनत में लगे रहते हैं और उनके छोटे बच्चे स्कूल के बाद या तो सड़कों पर भटकते हैं या गलियों में असुरक्षित माहौल में रह जाते हैं।

यहीं से एसएमबी फाउंडेशन की कहानी शुरू होती है — मानवीय संवेदना से उपजी पहल, जिसने शिक्षा, देखभाल और सुरक्षा को एक साथ जोड़ा।

एक रिटायर्ड अफसर की नई जिम्मेदारी

संस्था के संस्थापक ऋषिपाल, जो पहले दिल्ली शिक्षा विभाग में अधिकारी थे, बताते हैं —

“मैंने अपने पूरे करियर में देखा कि सरकारी योजनाओं के बावजूद कई बच्चे सिस्टम से बाहर रह जाते हैं। करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन जिन बच्चों को मदद की सबसे ज्यादा जरूरत है, वे वहीं के वहीं हैं। रिटायरमेंट के बाद मैंने ठान लिया कि अब वक्त है कुछ अपने दम पर करने का।”

इसी सोच ने 2021 में एसएमबी फाउंडेशन को जन्म दिया। शुरुआत में यह सिर्फ 10 बच्चों के साथ शुरू हुआ था, आज यह संख्या 100 से पार जा चुकी है।

ऋषिपाल कहते हैं, “हम इन बच्चों को सिर्फ किताबें नहीं, आत्मविश्वास देना चाहते हैं। वे खुद को समाज का हिस्सा महसूस करें, यही हमारी जीत है।”

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दूसरा घर, बेहतर भविष्य

संस्था का केंद्र हर दिन दोपहर बाद खुलता है। स्कूल से लौटे बच्चे यहीं आते हैं, जहां उन्हें पौष्टिक खाना, साफ कपड़े और सीखने का वातावरण मिलता है।

फाउंडेशन के स्वयंसेवक बच्चों के साथ खेलते हैं, उनका होमवर्क करवाते हैं, और समय-समय पर हेल्थ चेकअप भी कराते हैं। बच्चों को साफ-सफाई, स्वच्छता और बुनियादी शिष्टाचार भी सिखाया जाता है।

दीवारों पर बने रंगीन चार्ट, गिनती और अल्फाबेट के पोस्टर, और बच्चों के बनाए चित्र — सब बताते हैं कि यहां शिक्षा सिर्फ किताबों में नहीं, माहौल में है।

उत्तर प्रदेश, की रहने वाली सतरूपा, जो घरों में काम करती हैं, भावुक होकर कहती हैं —

“पहले मेरे बच्चे स्कूल से आने के बाद अकेले घर में रहते थे। डर लगता था कि कहीं गलत संगत में न पड़ जाएं। अब एसएमबी फाउंडेशन वाले उन्हें स्कूल से लाते हैं, खाना खिलाते हैं, और शाम तक संभालते हैं। मेरे बच्चे अब मुझे हिंदी पढ़ना सिखा रहे हैं — इससे बड़ी खुशी क्या होगी।”

वर्धमान जिले के अनीस भी कुछ ऐसा ही अनुभव साझा करते हैं।

“मेरे तीन बच्चे हैं। पहले स्कूल से लौटकर सड़क पर खेलते-फिरते थे। अब वे यहां आते हैं, पढ़ाई करते हैं और अनुशासन सीखा है। एनजीओ ने हमारी आधी चिंता खत्म कर दी।”

सिर्फ पढ़ाई नहीं, संस्कार भी

संस्था का उद्देश्य बच्चों को सिर्फ शिक्षित करना नहीं, बल्कि संस्कारित बनाना भी है। बच्चों को ‘थैंक यू’, ‘प्लीज’ जैसे शिष्टाचारिक शब्द सिखाए जाते हैं, ताकि वे आत्मविश्वास से संवाद कर सकें।

हर शनिवार को “स्टोरी टाइम” रखा जाता है, जहां स्वयंसेवक बच्चे को नैतिक कहानियां सुनाते हैं। इन कहानियों में ‘ईमानदारी’, ‘मेहनत’ और ‘सम्मान’ के मूल्य सिखाए जाते हैं।

साथ ही, फिटनेस और खेलकूद पर भी ध्यान दिया जाता है। बच्चों को योग और समूह खेलों में शामिल किया जाता है, ताकि वे शारीरिक रूप से स्वस्थ रहें।

महिलाओं और माताओं की भूमिका

एसएमबी फाउंडेशन (SMB Foundation) ने यह समझा कि बच्चों के विकास के लिए माताओं का शिक्षित और जागरूक होना भी जरूरी है। इसी सोच से संस्था ने “मदर क्लास” शुरू की — जहां माताओं को बच्चों की शिक्षा, पोषण और सुरक्षा के बारे में जानकारी दी जाती है।

संस्था की कोऑर्डिनेटर सना कहती हैं —

“अक्सर मां-बाप खुद अनपढ़ होते हैं। हम उन्हें सिखाते हैं कि बच्चे की पढ़ाई कैसे मॉनिटर करें, क्या खिलाएं, और उसे मोबाइल से कैसे दूर रखें।”

इन सत्रों ने कई परिवारों में सकारात्मक बदलाव लाया है। अब माता-पिता स्कूल मीटिंग में भाग लेने लगे हैं और बच्चों की रिपोर्ट कार्ड को समझने की कोशिश करते हैं।

सरकारी योजनाओं से अलग रास्ता

जहां सरकारी कार्यक्रम कई बार फाइलों तक सिमट जाते हैं, एसएमबी फाउंडेशन अपने सामुदायिक मॉडल पर टिके हुए है। संस्था किसी बड़े कॉरपोरेट फंड या ग्रांट पर निर्भर नहीं है, बल्कि स्थानीय दानदाताओं और स्वयंसेवकों के सहयोग से चलती है।

ऋषिपाल कहते हैं —

“हम दिखावे में नहीं, नतीजे में यकीन रखते हैं। जो बच्चा पहले झोपड़ी में नशेड़ी के बीच खेलता था, आज वह हिंदी कविता सुनाता है — यही असली बदलाव है।”

भविष्य की योजनाएं और डिजिटल शिक्षा

संस्था के संचालक लोकेश जी बताते हैं कि संस्था अब अगले चरण में प्रवेश कर रही है। योजना है कि दिल्ली के अन्य हिस्सों जैसे मंगोलपुरी, नरेला और शाहदरा में भी ऐसे ही आफ्टर-स्कूल केंद्र खोले जाएं।

इसके अलावा, एसएमबी फाउंडेशन (SMB Foundation) ने डिजिटल लर्निंग प्रोजेक्ट शुरू किया है। इसके तहत बच्चों को टैबलेट और ऑनलाइन लर्निंग ऐप्स से परिचित कराया जा रहा है ताकि वे तकनीक से पीछे न रहें।

संस्था ने “कम्युनिटी बुक बैंक” भी बनाया है, जहां लोग पुरानी किताबें, स्टेशनरी और बैग दान कर सकते हैं। स्थानीय स्कूल और कॉलोनीवासी भी इस मुहिम में जुड़ रहे हैं।

समाज में फैलती प्रेरणा

एसएमबी फाउंडेशन (SMB Foundation) का असर अब केवल बच्चों तक सीमित नहीं रहा। कई स्वयंसेवक, कॉलेज स्टूडेंट और रिटायर्ड शिक्षक इस पहल से जुड़ चुके हैं। वे हर सप्ताह कुछ घंटे यहां बिताते हैं, बच्चों को पढ़ाते हैं और करियर सलाह भी देते हैं।

दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा रूबी गुप्ता बताती हैं,

“यहां पढ़ाते हुए मुझे महसूस हुआ कि असली शिक्षा सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि देने की भावना में है। ये बच्चे बेहद जिज्ञासु हैं, बस किसी को उन्हें मौका देना होता है।”

मानवता की सच्ची मिसाल

जब शहर के ऊंचे मॉल और चमकदार ऑफिसों के बीच ये झुग्गी बस्तियां अक्सर उपेक्षित रह जाती हैं, तब एसएमबी फाउंडेशन जैसे संगठन यह याद दिलाते हैं कि विकास का असली अर्थ समान अवसर है।

यह संस्था बताती है कि समाज बदलने के लिए करोड़ों का बजट नहीं, बल्कि कुछ लोगों का समर्पण काफी है।

ऋषिपाल की टीम ने यह साबित कर दिया है कि अगर नीयत सच्ची हो, तो रोशनी सबसे अंधेरे कोनों तक पहुंच सकती है।